हम आपको कुछ वास्तविक जानकारी देने चाहेगे और उन लोगों को आयना बताना चाहेगे, जो समाज को ठगने के प्रयास मे नेता बने बैठे है, और कुछ नेता बनने के प्रयास मे है ।
वास्तविकता पर नजर डाले तो सामाजिक संस्थाऐं, समाज के विकास की घूरी होती है, जब ये धूरी काम करना बन्द कर देती है तो, ऐसी स्थिति मे फिर उत्पति होती है, कुछ नये समाजसेवी लोगों की, जो वास्तव मे समाज की सेवा करना चाहते है । और कुछ ऐसे लोगों जो इस बात के इन्तजार मे बैठे है, कि ये सामाजिक संस्थाऐ कब निष्क्रिय हो और तब हम नयी संस्थाऐ बनाये ।
ऐसी स्थिति मे विरोधी गुट के नेत्तृव को खड़ा करने के लिए, वर्तमान संस्थाओं से असन्तुष्ट, अपने आपको समाजसेवी कहने वाले लोग भी शामिल हो जाते है । यह वे लोग है जो वर्तमान संस्थाओं के गलत निर्णय के कारण यदा कदा संस्थाओं के प्रदेश या राष्ट्रीय स्तर के पदों पर रह चुके है । जिन्हे जनाधार नही होने के कारण हटा दिया गया है । किसी भी व्यक्ति की प्रदेश स्तर की नियुक्ति के लिए जरूरी है कि, उसका अपने जिले मे जनाधार हो । जो जिले का अध्यक्ष नही रहा है, उसे प्रदेशाध्यक्ष कैसे बनाया जा सकता है । यदि बना भी दिया जाये तो भी, उसकी हैसियत का आंकलन किया जाना चाहिये, कि उसने अपने समाज के लिए, क्या त्याग किया है ? उसकी व्यक्तिगत हैसियत क्या है ?, इसका समाज मे कोई अर्थ नही है । यदि कोई सरकारी कर्मचारी है तो, उसके द्वारा 58 या 60 वर्ष की उम्र मे समाजसेवा की बात करना बेमानी है, क्योकि उन्हे यह तो बताना ही पड़ेगा की पिछले 58 वर्षो से, वे कहा थे, जो आज सामाजिक संस्थाओं के पदों के लिए लालायत हो रहे है । वे लोग जो 58 वर्ष की उम्र मे समाज मे अपनी भूमिका तलासते है तो, उन्हे यह भूमिका केवल सरकार की नोकरी के चलते नही दी जा सकती, जबकि सरकार उसे अपने मकहमे से बाहर निकालने की तैयारी कर रही है, ओर वह सामाजिक संस्थाओं पर अपना बोझ मुफ्त मे डालना चाहते है जबकि उसके पास न तो जनाधार है, ना ही दानदाता का आधार है, ना ही त्याग, जबकि यह समाजसेवा की मूल कसोटी है । यही बात चाहे युवा मोर्चा के प्रदेशाध्यक्ष हो या अन्य कोई, उन पर भी लागू होती है । किसी भी ऐसे व्यक्ति कि नियुक्ती, बिना आंकलन किये, संस्थाओं के लिए बहुत घातक है, और इससे केवल विरोधी तैयार होते है, इससे ज्यादा कुछ नही ।
ऐसे लोग, जो वास्तव मे समाज की सेवा करना चाहते है, को समाज मे तथाकथित राजनेता बने लोग, अपनी हवा हवाई बातों से जैसे विधायक, सांसद, जिला प्रमुख, मैयर, चेयरमेन, जैसे पदों का हवाला देकर, ऐसे सच्चे समाजसेवी लोगों को हाईजेक कर देते है । उन्हे खुद भी पता नही लगता की, वे किस बहाव के साथ बह रहे है, उन्हे इसका अन्देशा भी नही रहता है ।
वर्तमान मे जैसे-जैसे चुनावी समय नजदीक आ रहा है, वैसे-वैसे समाज के राजनेता बनने के लिए भी, लोग बिल से बाहर आ रहे है । वे लोग अपना वास्तविक जनाधार तो बना नही पायें क्योंकि वे कभी समाजसेवी रहे ही नही, तो जनाधार कहा से आऐगा । स्थिति ऐसी है कि चुनाव आते ही, वे समाज को इकट्ठा करने कि बात कर रहे है । इसमे वे लोग भी शामिल है, जिसका पिछले कई सालों से समाजसेवा से कोई लेना-देना नही रहा । केवल अपने आपको नेता, विधायक बनाने के चक्कर मे समाज के कुछ अच्छी छवी के कार्यकर्ताओं को शामिल कर, उनकी छवी को अपने हितों के लिए उपयोग करने मे जुट गये है, और समाज मे एक नयी चेतना जागृत करने का प्रयास कर रहे है । अभी तक उन्हें ये पुछने वाला कोई नही मिला, कि पिछले इतने वर्षों से आप कहा थे । आपका जन्म अचानक राजनैतिक चुनाव मे कैसे हो गया और समाज की याद कैसे आ रही है, क्योकि बिना समाज के इनका कोई वजूद नही है । यह सभी लोग अच्छी तरह समझते है और अब यह ‘‘बरसाती समाजसेवी’’ समाज को बिना कुछ दिये, बिना त्याग के ही समाज के वोट बैंक का उपयोग, अपने स्वार्थ के लिए करना चाहते है और अपने आपको उनका नेता बनाना चाहते है । जो वोट बैंक के सोदे से ज्यादा कुछ नही । ऐसे लोगों की समाज और राजनैतिक पार्टियो मे क्या हैसियत होगी, आप और हम अच्छी तरह जानते है । ऐसे लोगो समाज को अपने फायदे के लिये, ठगने के प्रयास मे लगे हुए है । जो एक धोके से ज्यादा कुछ नही है ।
समाज को भी ऐसे लोगो का समर्थन नही करना चाहिये, जो अपने स्वार्थ पूर्ति के लिए समाज के सम्मेलन, एकजुटता, विकास की बात करते है । उन्हे यह पूछना चाहिये कि इतने दिन कहा थे, यह समाज और इनकी संस्थाऐ तो यही थी । इसमे कुछ अच्छी छवि वाले समाजसेवी भी ठगे जा रहे है । उन्हे भी इसका अहसास नही हो रहा है । ऐसे लोग, जो समाज के विकास की बात करते है, उनके पिछले इतिहास और कारनामों पर नजर डाले तो पता चलता है कि, उनमे व्यावहारिकता का गुण भी नही है । उनमे यदि विशेष गुण मौजूद है तो वह है कि, अपने ही लोगो के साथ धोखा करना, ठगना, उनको ठाल बनाकर, अपने नीजी स्वार्थपूर्ति के लिए उपयोग केसे किया जाए ।
Thursday, 18 February 2016
हमारे समाज के नेता
Sunday, 7 February 2016
ऋण
"ऋण क्या है"
मित्रों सामान्यतः लोग इस ऋण शब्द को केवल मात्र उधार लिये हुये धन से समझते है। लेकिन यह शब्द केवल मात्र इतने में ही नहीं सिमट जाता है। मित्रों इस ऋण शब्द कि व्याख्या कि जाये तो इस पर पूरी एक किताब कि रचना कि जा सकती है। संसार में आये प्रत्येक मानव पर तीन ऋण होते है।
1. पितृ ऋण
2. देव ऋण
3. ऋषि ऋण
पितृ ऋण से हम संतान को जन्म देकर के मुक्त होते है
देव ऋण से मुक्ति के लिये हम यज्ञ, पूजा इत्यादि करते है।
ऋषि ऋण से मुक्ति के लिये हम ऋषियों को तर्पण प्रदान करते है।
यह तो प्रत्येक मानव के उपर होने वाले ऋण है।
अब बात करते है कि मानव स्वार्थ के वशीभूत होकर किस प्रकार ऋणी बनता है।
1. कई बार लोग दुकान पर लोग सामान खरीदते समय 10 , 20 रूपये कम पडने पर दुकान वाले से बोल देते है, भैया बाद मैं आयेंगे तब दे जायेंगे ओर वहाँ से आने पर मन में पाप आ जाता है।
2. जब आप कहीं मार्ग भटक जायें ओर कोई आपको सही मार्ग बताये, तो उस व्यक्ति का ऋण आप पर चढ जाता है। पर उसको धन्यवाद देकर उसके ऋण से उऋण हुआ जा सकता हैं।
3. जब आप मन्दिर में जाने पर पुजारी जी, या ब्राह्मण के हाथों अपने मस्तक पर तिलक लगवाते हो ओर बदले में उन्हे कुछ नहीं देते हो तो आप ऋणी हो जाते हो। पर अगर यदि आप के पास देने के लिये धन नहीं हो तो कम से कम प्रणाम तो अवश्य करे।
4. जब आप कहीं कथा, प्रवचन में जाते हो तो कुछ ना कुछ अवश्य चढाकर आयें क्यों कि आपको वहाँ कथावाचक से ज्ञान मिलता है। नहीं चढाने पर आप पर कथावाचक या ज्ञान देने वाले का ऋण हो जायेगा।
4. जब आप किसी के यहाँ भोजन करने जाते हो तो कम से कम आपके भोजन के मूल्य कि कीमत जितना उपहार वहाँ भेंट करके जरूर आये। या कभी कभी भोजन करवाने वाले को को भी आप भोजन करवाये।
5.जब आप किसी गुरू से ज्ञान ग्रहण करते है तथा बदले में उन्हे दक्षिणा नहीं देते हो तो आप के जीवन में गुरू का वह ज्ञान फलित नहीं होगा। एकलव्य ने गुरू द्रोणाचार्य को हाथ का अंगुठा काटकर एसे ही नहीं दे दिया था।
6. जब आप किसी ज्योतिषी से अपनी जन्मपत्रिका का या हस्तरेखा का परीक्षण करवाते हो और बदले में कुछ नहीं देते हो तो उस ज्योतिषी द्वारा दिये गए मार्गदर्शन से आपके जीवन में श्रेष्ठता तो आती हैं, पर उसके गुरु-ऋण के चलते भविष्य में ऐसी समस्याएँ आ जाती हैं जिसका समाधान किसी से नही हो पाता। इसलिये जीवन में कितने भी उपाय करने के बाद यदि सुख न आये तो अपने जीवन के भूतकाल में झाँककर देखे की ऐसे किसी गुरु का कहीं कोई ऋण तो नही रह गया।
दोस्तों जब आप किसी से भी अपना कार्य करवाकर उसको उसका मेहनताना नहीं देते हो तो आप ऋणी हो जाते हो। हालाँकि मानव का विवेक उसे सब कुछ बताता है कि...
सही क्या है ओर गलत क्या है...
किन्तु मानव कि आँखों पर स्वार्थ कि पट्टी बंध जाती है जिसके चलते वो अपने विवेक की आवाज नही सुन पाता। पर दोस्तों यह सब ऋण हमें किसी ना किसी रूप में 100% ब्याज सहित चुकाना ही पडता है। इस जन्म में नहीं तो अगले जन्म में चुकाना पडेगा लेकिन चुकाना पडेगा, इसमें कोई सन्देह नही।