दीपावली का अर्थ है दीपों की पंक्ति। दीपावली शब्द ‘दीप’ एवं ‘आवली’ की संधिसे बना है। आवली अर्थात पंक्ति, इस प्रकार दीपावली शब्दका अर्थ है, दीपोंकी पंक्ति । भारतवर्षमें मनाए जानेवाले सभी त्यौहारों में दीपावलीका सामाजिक और धार्मिक दोनों दृष्टि से अत्यधिक महत्त्व है। इसे दीपोत्सव भी कहते हैं। ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ अर्थात् ‘अंधेरे से ज्योति अर्थात प्रकाश की ओर जाइए’ यह उपनिषदोंकी आज्ञा है। इसे सिख, बौद्ध तथा जैन धर्म के लोग भी मनाते हैं। माना जाता है कि दीपावली के दिन अयोध्या के राजा श्री रामचंद्र अपने चौदह वर्ष के वनवास के पश्चात लौटे थे। अयोध्यावासियों का ह्रदय अपने परम प्रिय राजा के आगमन से उल्लसित था। श्री राम के स्वागत में अयोध्यावासियों ने घी के दीए जलाए । कार्तिक मास की सघन काली अमावस्या की वह रात्रि दीयों की रोशनी से जगमगा उठी। तब से आज तक भारतीय प्रति वर्ष यह प्रकाश-पर्व हर्ष व उल्लास से मनाते हैं। यह पर्व अधिकतर ग्रिगेरियन कैलन्डर के अनुसार अक्तूबर या नवंबर महीने में पड़ता है। दीपावली दीपों का त्योहार है। इसे दीवाली या दीपावली भी कहते हैं। दीवाली अँधेरे से रोशनी में जाने का प्रतीक है। भारतीयों का विश्वास है कि सत्य की सदा जीत होती है झूठ का नाश होता है। दीवाली यही चरितार्थ करती है- असतो माऽ सद्गमय , तमसो माऽ ज्योतिर्गमय। दीपावली स्वच्छता व प्रकाश का पर्व है। कई सप्ताह पूर्व ही दीपावली की तैयारियाँ आरंभ हो जाती है। लोग अपने घरों, दुकानों आदि की सफाई का कार्य आरंभ कर देते हैं। घरों में मरम्मत, रंग-रोगन,सफ़ेदी आदि का कार्य होने लगता हैं। लोग दुकानों को भी साफ़ सुथरा का सजाते हैं।
Tuesday, 17 October 2017
Wednesday, 20 September 2017
आज और कल पर निर्मित समाज
भारत एक ऐसा देश है, जहाँ पर विभिन्न प्रकार के जाति, धर्म, समुदाय के लोग मिल कर रहते है और इस एकजुटता की बुनियाद बनती है आदर्शवादिता से ।
आदर्शवादिता की परिभाषा हमारे समाज मे हो रहे अच्छे और बुरे की परख से एवं मनुष्य की चेतना से उबर कर बनता है । हमारी संस्कृति, हमारी सभ्यता आदर्श से मिलकर बनी हुई होती है । मनुष्य अपना आदर्श स्वयं तय करता है, भला या बुरा पर आदर्शवादिता स्वयं मे एक सकरात्मक उर्जा का प्रवाह लेकर चलता है ।
इतिहास मे कई वीर योद्धा, वीरांगनाएँ एवं क्रांतिकारियों ने आदर्श के बल पर फतह हासिल की, वो आदर्श जिसके सहारे वे जीवन के कठिन परिस्थितियों का भी सामना कर गए पर आज हमारे युवा वही नैतिकता एवं आदर्शवादिताको भूलते जा रहे है, ज्ञान अर्जित करने पर भी मानव मूल्य का तिरस्कार कर रहे है और अपनी संस्कृति, संस्कार को सामाजिक बंधन मानकर आजादी की नई परिभाषा गढ़ रहे है ।
आदर्शवादिता स्वयं के लिए नही, समाज के हित के लिए काम करता है, आदर्श पर चलने वाला समाज को जोड़ कर रखता है, एवं एकता का प्रतीक होता है, पर आज का नवयुवक समाज के लिए भ्रम और अपने लिए कर्म करता है । पहले के समय मे परिवार संगठित होकर रहताथा, जिससे की बच्चो एवं युवाओं को रिश्तों की मर्यादा, उसके महत्व का ज्ञान होता था और वे एक अच्छे आदर्शो पर चलकर समाज का हित करते थे पर अब इस बदलते हुए समाज ने रिश्तें की एकजुटता को बंधन का नाम दिया और टूटते रिश्ते को आज़ादी का । पश्चिमी सभ्यता का प्रभाव कहे या आज के युवा का आत्मकेंद्रित स्वभाव, अब तो वो अपने परिवार तो क्या माता-पिता के साथ भी रहना पसंद नहीं करते । युवा तो क्या बच्चे भी बड़ो के पाँव छूना, उनका आदर करना भूल गए है।
आज के युवा का आदर्श स्वार्थ रह गया है। वो अपनी ही बनाई हुई दुनिया मे जीना चाहते है, “वेक अप सिड ” जैसी मूवीज को देखकर खुद को सिड समझते है, जबकी वास्तविकता इन सबसे भिन्न होती है, समयानुसार सबकी परिस्थितियाँ अलग होती है ।
अजीब विडंबना है ये, कि जहाँ ज्ञान का अर्थ सोच को एक नई दिशा देना होता है वही पर आज की सोच दूसरे की सभ्यता से प्रभावित होकर बनी हुई होती है। आज का युवा अपने समाज के संस्कृति, सभ्यता को सहेजने के बजाय उसका तिरस्कार कर रहा है। उसे अब ना अपनी भाषा का ज्ञान है, ना अपने लोगो के दर्द का, बस याद है तो वो चकाचौंध रोशनी जिसे पाकर वो अपनी पहचान बनाना चाहता है परंतु स्वयं गुम हो जाता है ।