Thursday, 19 November 2015

सभ्य + मानव + जनसमूह = समाज

हम सब पहले एक मनुष्य हैं फिर बाद मे और कुछ, हमे अपने समाज के अन्य लोगों के लिए भी कुछ सोचे, उनके लिए कुछ अवश्य करें, नही तो हम मनुष्य कहलाने के हक दार नही है । एक समाज का निर्माण मनुष्यों से होता है । अगर मनुष्यों का चरित्र, व्यवहार, रहन-सहन का स्तर ऊंचा होगा तो हम उस समाज को एक अच्छा और सशक्त समाज कह सकते हैं । प्रत्येक समाज का एक अपना परिचय अवश्य होता है । जैसा समाज होगा उसका वैसा ही उसका परिचय होने के साथ-साथ उस समाज के व्यक्ति का व्यवहार करने का तरिका होगा । यह एक अलग बात है कि हर समाज मे कुछ अच्छे और कुछ बुरे लोग होते हैं । यह तो हमारे ऊपर निभर करता है कि हम उनमे से क्या है और अपने लिए वैसा ही परिवेश और लोग को अपने लिए चुनते हैं ।
कितने मतलबी है न हम इंसान ? किसी की परेशानी किसी के दुःख से हमे क्या लेना देना । हमको मतलब है तो सिर्फ अपने आप से और कभी-कभी अपने परिवार से भी... पर आज हम अवश्य यह नहीं कह सकते की हमको अपने परिवार की भी उतनी ही चिंता है जितनी अपनी । क्यों ? क्यूंकि हम खुद ही नहीं जानते हम क्या कर रहे हैं क्यों कर रहे हैं किसके लिए कर रहे हैं ... जिस समाज में हम रह रहे है उस समाज में और भी लोग है जो अलग-अलग स्थिति में रह रहे है । पर हम यकीनन यह कह सकते हैं कि भाई जो हम कर रहे हैं अपने लिए कर रहे हैं और इन लोगों का कहना तो यह है पहले हम अपने लिए तो कर ले, अपने परिवार के लिए तो कर ले फिर दूसरे के लिए सोच लेंगे । यह कह कर सब कन्नी काट जाते है "चलों पीछा छुटा, पता नहीं लोगों को हमसे क्या परेशानी है । लगता है सब हमसे जलते है, हमारा सुकून लोगों को गवारा नहीं लगता ।"
जिस स्थान पर जल रहता है, हंस वही रहते हैं । हंस उस स्थान को तुरंत ही छोड़ देते हैं जहां पानी नहीं होता है। हमें हंसों के समान स्वभाव वाला नहीं होना चाहिए ।
आचार्य चाणक्य कहते हैं कि हमें कभी भी अपने मित्रों और रिश्तेदारों का साथ नहीं छोडऩा चाहिए । जिस प्रकार हंस सूखे तालाब को तुरंत छोड़ देते हैं, इंसान का स्वभाव वैसा नहीं होना चाहिए । यदि तालाब में पानी न हो तो हंस उस स्थान को भी तुरंत छोड़ देते हैं जहां वे वर्षों से रह रहे हैं । बारिश से तालाब में जल भरने के बाद हंस वापस उस स्थान पर आ जाते हैं, हमें इस प्रकार का स्वभाव नहीं रखना चाहिए । हमें मित्रों और रिश्तेदारों का सुख-दुख, हर परिस्थिति में साथ देना चाहिए । एक बार जिससे संबंध बनाए उससे हमेशा निभाना चाहिए । हंस के समान स्वार्थी स्वभाव नहीं होना चाहिए ।
आज जिस तरह से हमारे समाज में बदलाव हो रहे हैं ऐसे हालात में अच्छे और बुरे में पहचान करना बहुत ही कठिन कार्य हो गया है हमारे इस आधुनिक समाज में पढ़ाई-लिखाई को बहुत महत्व दिया जा रहा है मगर पढ़े-लिखे लोग ही अच्छे लोग हों यह जरूरी नहीं है । बहुत अफसोस की बात है कि हमें जो पढ़ाया जा रहा है वह व्यावहारिक नहीं है और यह किताबी पढ़ाई हमें आदमी से मशीन बना रही है व हमें एक दूसरे के सुख-दुख से दूर करती जा रही है । हम सभ्य और विकसित होने का दावा तो करते हैं मगर किसी के दुख या परेशानी में शामिल होने के लिये हमारे पास समय नहीं है । हमारे समाज में आज सीधे-सादे और अच्छे लोगों की कोई इज्जत नही होती है और उन्हें परेशान किया जाता है जबकि भ्रष्ट और दुराचारी लोगों का सम्मान किया जाता है । आज के इस आधुनिक समाज में सादगी और सदाचारी की जगह बनावटी और भ्रष्टाचारी लोगों का का राज है जो जनता के सामने तो सदाचार और नैतिकता की बातें करते हैं मगर पीठ पीछे दुराचार और अनैतिक बातों में लगे रहते हैं । हम आज जिस आधुनिक समाज में रह रहे हैं वह हमें अपने अधिकारों के बारे में तो हमें बताता है मगर हमें अपने कर्तव्यों के बारे में जागरूक नहीं करता जैसे कि हमारे पूर्वजों ने जो पेड़ लगाये थे उन पेड़ों से हमें शुद्ध और ताजी हवा मिलती है मीठे फल मिलते हैं और ठंडी छांव मिलती है । हम लोग अपने पूर्वजों के लगाये हुये पेड़ तो अपनी जरूरतों के लिये काट देते हैं मगर अपनी आने वाली पीढ़ी के लिये पेड़ नहीं लगाते जिसकी वजह से आने वाली पीढि़यों को शुद्ध और ताजी हवा मीठे फल और ठंडी छांव कैसे मिल पायेगी इसके बारे में हम नहीं सोचते । आज हमें जरूरत है ऐसी पढ़ाई की जो हमें अपने अधिकारों के बारे में तो पढ़ाये ही और साथ ही हमे अपने कर्तव्यों के बारे में जागरूक भी बनाये जिससे हम पढ़ें-लिखें और साथ में एक अच्छे इंसान भी बन सकें ।
यह हमारा समाज है कि जो हमारे लिए आगे बढने के लिए उत्प्रेरक का काम करता है । अगर समाज का डर न हो तो इंसान इंसान नहीं रह सकता । हम तो खुद कैसे भी अपना जीवन बिता लेंगे । फिर जिंदगी के दरिया में कहीं न कहीं किनारे पर लग कर अपना जीवन व्यतीत कर ही लेंगे । अब क्योंकि हम इस समाज के महत्वपूर्ण अंश है, इसलिए हम हर पल समाज के आगोश में रहते है । समाज की बंदिशों का डर रहता है कि हम किसी भी काम को करने से पहले बहुत बार सोचने को मजबूर हो जाते है । अगर हमारी वजह से कोई गलत काम हो गया, तो कहीं मुंह दिखाने लायक भी नहीं रहेगे, फिर हमारे माता-पिता व हमारा परिवार समाज से कट भी सकता है और यही छोटी-छोटी बातें हमको कुछ सकारात्मक व सार्थक करने के लिए प्रेरित करती है । निम्न व मध्यम वर्गीय परिवारों की तरक्की के रास्ते समाज ही दिखाता है । जबकि उच्च वर्गीय परिवारों को समाज की कोई परवाह नहीं होती है, उनको लगता है कि वह समाज से ऊपर है । यह अलग बात है कि अपवाद हर जगह पर हो सकते हैं । बचपन से लेकर वृद्धावस्था तक के लंबे सफर में सबसे बेशकीमती युवावस्था का समय हमारी जिंदगी का महत्वपूर्ण पड़ाव होता है, और इसी पडाव पर हमको बचपन की सुनहरों यादों के साथ सपनों को साकार करने प्रयास करना चाहिए, ताकि हम वृद्धावस्था में अपने समाज में गर्व से कह सके कि देखो और समझो हमने जिंदगी के दरिया में मजबूत व दृढ इच्छा-शक्ति के बल पर तैर कर अपने लिए वह मुकाम हासिल किए है, जो कामयाबी के शिखर बन गए । अगर हमने युवावस्था में समाज की परवाह नहीं की, तो ऐसा हो सकता है कि वृद्धावस्था में समाज हमारा साथ छोड दे और हम अकेले रह जाए, जिंदगी के आखिरी मोड पर । इसलिए जरूरी हो जाता है कि हमको अपना कल को संवारने के लिए आज समाज को सम्मान देकर और उससे प्रेरणा लेते हुए आगे बढने की कोशिश की जाए ।
हमारा समाज तो हम सब के लिए एक अच्छी और साफ़-सुथरी जिन्दगी जीने का मुख्य आधार है, अगर हम समाज को दरकिनार करेंगे तो हमारा जीवन एक नरक की तरह बन जाता है, निजी जीवन जीने के लिए आज कल पैसा ही सब कुछ है, पर समाज में भी रहना जरुरी है, जीवन में आदमी महान कब होता है जब इज्जत-मान-मर्यादा हर आदमी का अपना परिवार होता है, इसके लिए समाज बहुत जरुरी है, अपने कल संवारने के लिए आज समाज को सम्मान देकर और उससे प्रेरणा लेते हुए आगे बढने की कोशिश की जाए ।
हमें अपने समाज से बुराई को हटाना होगा । जब तक हम समाज में व्याप्त बुराई को हटाने में कोई सहयोग नहीं करते हैं तब तक हम उन्नति नही कर सकते । कितने लोग सोचते व कहते हैं कि एक हमारे चाहने से क्या होगा .......... पूरा दुनियाँ ऐसी हैं तो क्या एक सिर्फ हमारे सुधरने से दुनियाँ सुधर जायेगी ............ इस तरह से लोग कई बात कहते हैं । पर हमें सोचना व समझना चाहिए कि हम और आप जैसे व्यक्तियों से ही यह समाज बना है । तब फिर हमारे व आपके सुधरने से यह समाज क्यों न सुधरेगा ? याद रखें हमारे-आपके सहयोग से ही इस समाज की उन्नति संभव है । और हमारे-आपके सहयोग से ही समाज से रूढीवादी कुरीतियां समाप्त हो सकती है । अन्यथा समाज की रूढीवादी कुरीतियां हमें ही कुचल देगी । समाज सुधार सुशिक्षितों का अनिवार्य धर्म-कत्र्तव्य है । अतः हम सभी से यह आह्वान करना चाहते है कि अपने में सुधार लाते हुए समाज को सुधारने में अपना योगदान दें । यही हमारी नववर्ष की खुशी होगी । हम बदलेंगे युग बदलेगा । हम सुधरेंगे युग सुधरेगा ॥

Wednesday, 18 November 2015

जीवन

किसी ने पूछा, "जीवन क्या है?"
एक उत्तम उत्तर......
जब मनुष्य जन्म लेता है तो उसके पास सांसे तो होती हैं पर कोई नाम नहीं होता और जब मनुष्य की मृत्यु होती है तो उसके पास नाम तो होता है पर सांसे नहीं होती।  इसी सांसे और नाम के बीच की यात्रा को "जीवन" कहते हैं।

समाज

मानव एक सामाजिक प्राणी है । ‘प्राणी’ इस जगत का सर्वाधिक विकसित जीव है ओर इस समाज के बिना उसका रहना कठिन ही नहीं असंभव है । माता-पिता, भाई-बहन, रिश्तेदारों आदि लोगों को मिलाकर ही इस समाज की रचना होती है । समाज के बिना मानव का पूर्ण रूप से विकास होना सम्भव ही नहीं है । इसलिए मानव को हर कदम कदम पर समाज की आवश्यकता होती है समाज के लोगों के बीच ही हम अपने जीवन का अधिकतर समय व्यतित करतें है । हम जिस समाज में रहते हैं उन्हीं के बीच हम खाते हैं, पीते हैं, जीते हैं व रहते है हमे निस्वार्थ भाव से समाज के लोगों की सेवा, मदद, हित करना। इससे पूरे राष्ट्र की व्यवस्था मे सुधार किया जा सकता है । समाज सेवा के द्वारा सरकार और जनता दोनों की आर्थिक सहायता की जा सकती है । पड़ोसियों की सेवा करना भी समाज सेवा ही है । आज हमारे देश का भविष्य युवाओं पर निर्भर है, अतः समाज की सेवा करना हर युवा का कर्तव्य है । समाज के सेवकों का यह कर्तव्य है कि वे सच्चे दिल से समाज की सेवा करें । सच्चे हृदय से की गयी समाज सेवा ही इस देश व इस पूरे संसार व समाज का कल्याण कर सकती है ।
जिस तरह हर व्यक्ति निस्वार्थ भाव से अपने परिवार की तन, मन, धन से समर्पित होकर पूर्ण रूप जिम्मेदारी/दायित्व उठाते हुए सेवा करता है । उसी प्रकार हर व्यक्ति की अपने समाज के प्रति भी जिम्मेदारी बनती है कि वह अपने परिवार की तरह ही अपने समाज के लिये सौच विचार करे तथा समाज के प्रति अपने कर्त्वयों का निर्वाह करे ओर समाज सेवा को एक जिम्मेदारी के साथ निभाये । हमारा परिवार भी समाज का एक हिस्सा होता है । उसी समाज के कारण आज हमारी और हमारे परिवार की पहचान होती है । इसलिये जितनी जिम्मेदारी हमारी हमारे परिवार के लिये होती है उतनी ही जिम्मेदारीयां हमारी हमारे समाज के प्रति भी बनती है ओर इन जिम्मेदारीयों का परिवहन बिना किसी निस्वार्थ भाव के करना समाज के हर नागरिक का कर्तव्य है ।
मानव होने के नाते जब तक हम एक-दूसरे के दुःख-दर्द में साथ नहीं निभाएँगे तब तक इस जीवन की सार्थकता सिद्ध नहीं होगी । वैसे तो हमारा परिवार भी समाज की ही एक इकाई है, किन्तु इतने तक ही सीमित रहने से सामाजिकता का उद्देश्य पूरा नहीं होता । हमारे जीवन का अर्थ तभी पूरा होगा जब हम समाज को ही परिवार माने । 'वसुधैव कुटुम्बकम' की भावना को हम जितना अधिक से अधिक विस्तार देंगे, उतनी ही समाज में सुख-शांति और समृद्धि फैलेगी । मानव होने के नाते एक-दूसरे के काम आना भी हमारा प्रथम कर्तव्य है । हमें अपने सुख के साथ-साथ दुसरे के सुख का भी ध्यान रखना चाहिए । अगर हम सहनशीलता, संयम, धैर्य, सहानुभूति, और प्रेम को आत्मसात करना चाहें तो इसके लिए हमें संकीर्ण मनोवृत्तियों को छोड़ना होगा । धन, संपत्ति और वैभव का सदुपयोग तभी है जब उसके साथ-साथ दूसरे भी इसका लाभ उठा सकें । आत्मोन्नति के लिए ईश्वर प्रदत्त जो गुण सदैव हमारे रहता है वह है सेवाभाव, समाज सेवा । जब तक सेवाभाव को जीवन में पर्याप्त स्थान नहीं दिया जाएगा तब तक आत्मोन्नति का मार्ग प्रशस्त नहीं हो सकता । कहा भी गया है की भलाई करने से भलाई मिलती है और बुराई करने से बुराई मिलती है.......

Monday, 16 November 2015

छठ पूजा

लोक आस्‍था का महापर्व छठ हमें कई सीख देता है।

1-केवल उगते हुए नहीं, डूबते हुए सूर्य को भी नमन किया जाता है।

2-समाज में सबसे अंतिम पंक्ति में गिने जाने एवं अछूत माने जाने वाले डोम जाति के हाथों बने कच्‍चे बांस के सूप से भगवान भास्‍कर को अर्घ्‍यदान किया जाता है।

3-समाज में कायम भेदभाव को भूलकर लोग एक छठ घाट पर इकट्ठे होकर पूजा-अर्चना करते हैं।

4-सामूहिकता व सामाजिकता  के बिना जीवन अधूरा है।

5-जीवन में सादगी और सच्‍चाई का अव्‍वल स्‍थान है।

महा पर्व छट पुजा की हार्दिक शुभकामनाएँ

Sunday, 15 November 2015

बदलाव

एक बार मैं घूमने गया. वहां लोगों ने बताया की यहाँ एक ऐसा स्थान है जहाँ से बोलने से सबकी आवाज़ 3 से 5 गुना लौट कर आती है, ऐसे स्थान को हम लोग ECHO Point (आवाज़ का गूंजना) भी कहते हैं. लोगों ने यह भी बताया कि इस जगह से जो भी बोलेंगे वह बात 3 से 5 बार गूंज गूंज कर वापस आएगी और मुझे तो सुनाई देगी ही देगी, यहाँ पर हम सब लोगों को भी सुनाई देगी। मैंने भी ऐसा करने की सोची और दो बार आवाज़ लगाई और जो जो बोला और उसकी आवाज़ किस तरह से गूंजी और सबको सुनाई दी, वह इस प्रकार है :-
1) मैंने पहली बार आवाज़ लगाई - तुम अच्छे हो.
वहां से आवाज़ लौट कर आई और सबने सुनी - तुम अच्छे हो, तुम अच्छे हो, तुम अच्छे हो, तुम अच्छे हो, तुम अच्छे हो.
2) मैंने दूसरी बार आवाज़ लगाई - तुम गंदे हो.
वहां से आवाज़ लौट कर आई और सबने सुनी - तुम गंदे हो, तुम गंदे हो, तुम गंदे हो, तुम गंदे हो, तुम गंदे हो.
(मित्रों यहाँ महत्वपूर्ण ये है कि आवाज सिर्फ मैंने अकेले लगाई थी, पर जब वो लौट कर आई तो सबने सुनी।
मित्रों, ये पूरी सृस्टि भी एक ECHO System पर काम करती है, हम दूसरों के लिए जो भी बोलेंगे, दूसरों से जैसा व्यव्हार करेंगे, दूसरों की जो भी मदद करेंगे, जो भी करेंगे अच्छा या बुरा, वो हमारे पास या हमारे किसी करीबी के पास गूंज गूंज कर लौट कर आएगा ही आएगा, बस इसमें एक SUSPENSE है कि - कब आएगा, कैसे आएगा, कितना आएगा, यह कोई नहीं जानता ?? पर यह इस बात पर निर्भर होगा कि हम अपने रोज़ के कर्म किस दिशा में ले कर जा रहे हैं.
जैसे कि हर काम, हाँ मित्रों हर काम करने से पहले हमारे पास दो choice होती है जो हमारी Destiny (भाग्य) तय करती है.
जैसा की ऊपर वाले Example में मैंने किया, अच्छा भी बोला और बुरा भी बोला, दोनों ही Case में Result हम सभी के सामने था.
किसी ने सही कहा है :-
पत्ते फूल को कितना भी छुपाने की कोशिश करें, फूल की खुशबू हवा की दिशा में बहती ही बहती है. उसी तरह कबाड़ की बदबू भी हवा की दिशा में बहती है.
अब एक महत्रपूर्ण बात - फूल की खुशबू और कबाड़ की बदबू तो चलो हवा की दिशा में बहती है पर इंसान के द्वारा बोली गई बातें और किये हुए काम अच्छे या बुरे हर दिशा में 3 से 5 गुना नहीं, बल्कि हजारों गुना गूंज गूंज कर फैलते है।
मित्रों जो बोलें, जब बोलें, जिसके बारे में बोलें या जो करें, जब करें, जिसके लिए करें, ध्यान रहे वो अच्छा हो या बुरा, आगे गूंज गूंज कर जायेगा ही जायेगा।
कोई भी बात Secret एक ही Condition में रह सकती है जब वो बात सिर्फ और सिर्फ आपको पता हो.
अगर बात आपके मुँह से निकली तो सामने वाले को आप कितनी भी कसमें खिलवा दें वो हवा में चारों तरफ गूंज गूंज कर फलेगी ही फलेगी.
आपके द्वारा किया हुआ कोई भी काम आप कितना भी छुपा लें वो हवा में चारों तरफ गूंज गूंज कर फैलेगा ही फैलेगा.
इसलिए मित्रों जब उस बात ने चारों तरफ गूंज गूंज कर फैलना ही है तो क्योँ न दूसरों के बारे में अच्छी बातें फैलाएं, उनके बारे में अच्छा बोलें, उनके लिए अच्छा काम करें, क्या जरुरत है दूसरों के बारे में बुरी-बुरी बातें बोलने की या उनके रास्तों में गड्ढे खोदने की जबकि एक न एक दिन पता लग ही जाना है कि ये बातें किसने फैलाई या ये काम किसने किया।
हम अच्छे तो जग अच्छा ..........

Saturday, 14 November 2015

हम का वहम

सुंदरता की तलाश में चाहे हम
सारी दुनिया का चक्कर लगा
आएं,,,

लेकिन अगर वो
     हमारे अंदर नहीं है,
               तो कहीं नहीं …

गतिमान है काल का पहिया,
अनमोल समय न कर तू व्यर्थ,
सांस के रथ के रुकने से पहले,
ढूंढ ले अपने होने का अर्थ..!

दिपावली की हार्दिक शुभकामनायें

दिवाली पर्व है खुशियों का, उजालों का, लक्ष्मी का, इस दिवाली आपकी जिंदगी खुशियों से भरी हो, दुनियां उजालों से रोशन हो, घर पर माँ लक्ष्मी का आगमन हो!
आप सभी को व आपके सपरिवार को दिपावली की हार्दिक शुभकामनायें...!