Monday, 25 April 2016

गृहस्थ दुख के मूल कारण

जब भारत में वैदिक संस्कृति यौवन पर थी,तब भारत के वे दिन सुनहरे दिन थे;तब गृहस्थाश्रम सब आश्रमों का सरताज था।तब विवाह के सम्बन्ध में यह हीन भावना नहीं थी कि विवाह क्या है?उम्र-कैद और कमाई जुर्माना।परन्तु मिथ्या और अधूरे वैराग्य के कारण तथा वेद मर्यादा के लोप हो जाने से आज गृहस्थाश्रम को दुःख-सागर कहा जाने लगा है।परन्तु वैदिक काल में गृहस्थाश्रम की बड़ी महिमा थी।गृहस्थ को ब्रह्म-प्राप्ति में बाधक नहीं साधक समझा जाता था।बड़े-बड़े ऋषि-महर्षि जो ब्रह्म-विद्या के आचार्य थे,वे गृहस्थी थे।राजा जनक,राजा अश्वपति,योगी याज्ञवल्क्य,सब गृहस्थी थे।फिर गृहस्थ के सम्बन्ध में मिथ्या भावना कैसे जागी?

(1) सबसे पहला कारण है-यह हीन विचिर कि जगत् मिथ्या है।चलो,मिथ्या ही समझ लिया था तो फिर मिथ्या का संग्रह नहीं करना था।दोनों बातें साथ-साथ क्यों रक्खी गई?

(2) दूसरा कारण यह है कि मानव-जीवन के उद्देश्य को ही भूला दिया गया।वाम-मार्ग ने यह प्रचार किया-खाओ,पिओ और मौज उड़ाओ।

(3) तीसरा यह कि गृहस्थी को भोग-विलास का आश्रम समझ लिया गया।

(4) चौथा कारण यह कि धन को ही मुख्य स्थान दे दिया गया।

(5) पाँचवा कारण यह कि कन्या-जन्म पर शोक-दुःख मनाया जाने लगा।एक मित्र ने दूसरे मित्र से पूछा-'कहिये,क्या हाल है?"
मित्र कहने लगा-'भाई,क्या पूछते हो ! पचास हजार रूपये की डिग्री मेरे ऊपर हो गई है।'
मित्र ने पूछा-'कैसे ?'उत्तर मिला,'घर में कन्या पैदा हो गई है।'

(6) और सबसे बड़ा कारण है-दृष्टिकोण का बदल जाना।
अब तो केवल एक ही विचार सामने रहता है:-धन-दौलत एकत्र करने का।किसी युवक से पूछिये-'इतना कष्ट उठाकर पठन-पाठन में क्यों लगे हो?'उत्तर होगा-'अच्छी नौकरी मिलेगी।व्यापार में सहायता मिलेगी।किसी अच्छे परिवार की सुन्दर कन्या मिल सकेगी।'

किसी युवती से प्रश्न कीजिए-'स्वास्थय बिगाड़कर भी दिन-रात क्यों पढ़ रही है?'
उत्तर उसी प्रकार का होगा कि धन कमाने के लिए।

भारत के कितने ही परिवारों से पूछो कि तुम लड़कियों को ईसाई-स्कूलों में क्यों पढ़ाते हो?उत्तर होगा-कान्वैंट में पढ़ी लड़की को बड़े घरों वाले पसंद करते हैं और अच्छे वर मिलते हैं।हिन्दुओं में विशेष रुप से धन की प्रधानता हो गई है।

अब तो सहशिक्षा तथा दूसरे कितने ही साधनों से लड़कियों ने Boy Friends और लड़कों ने Girl Friends बनाने शुरु कर दिये हैं।ऐसी मित्रता का प्रारम्भ होता ही कामवासना से है।यह वास्तविक मित्रता और शुद्ध प्रेम तो होता नहीं और उद्देश्य भी वही होता है।इसलिए विवाह हो जाता है।
ऐसे विवाह होने के पश्चात् कुछ लोग तो जैसे-तैसे निभाते चले जाते हैं और कुछ पछताने लगते हैं।कामवासना का भूत सिर से उतरने लगता है तो पति-पत्नि को एक-दूसरे की बातें चुभने लगती हैं।

इस परिवर्तन में गृहस्थ को दुःख का सागर कहा जाने लगा है।पश्चिमी सभ्यता ने भारत पर जादू कर रक्खा है।चूंकि पश्चिम में विवाह से पूर्व ही मित्र बनाने का कार्य होता है और इधर भारत में भी कुछ अवस्था ऐसी ही हो रही हैं।
भारत में यह प्रथा थी कि विवाह पहले होता था और मित्रता धीरे-धीरे बढ़ती थी जो मृत्यु-पर्यन्त बढ़ती चली जाती थी।पश्चिम वाले पहले मित्रता करते हैं और फिर विवाह करते हैं और उनकी मित्रता कम ही होती चली जाती है।

इंगलैण्ड से एक मानसिक पत्रिका 'साइकालोजी' प्रकाशित होती है।उसमें यह लिखा था कि गत वर्ष इंग्लैण्ड तथा वेल्ज़ में अपनी पसन्द के तीन लाख पचिस हजार विवाह हुए,जिनमें से एक लाख सोलह हजार थोड़े ही समय में टूट गये।मित्र बनाकर किए हुए विवाहों की यह दशा देखकर भी भारत शिक्षा नहीं लेता।

विवाह से पूर्व मित्र बनाने की प्रथा और भी बुरे परिणाम पैदा कर रही है।इसी पत्रिका 'साइकालोजी' में लिखा है कि पिछले एक वर्ष में इंग्लैण्ड तथा वेल्ज़ में ३७ हज़ार कुमारी लड़कियों के बच्चे हुए।

क्या ऐसी बातें गृहस्थ में अधिक दुःख नहीं बढ़ा देंगी?दुनिया बड़ी बदल गई है।भारत को भी बदलना चाहिए;परन्तु हानिकर बातों की नकल से तो दुःख की मात्रा बढ़ती ही जाएगी।

अब तो पश्चिमी सभ्यता को अपनाने वाले विवाह को एअ प्रकार का व्यापार समझते हैं।विवाह के बहाने धन कमाओ,साथ ही कामवासना की भी तृप्ति करो।परिणाम क्या हो रहा है?-

(1) पढ़ी-लिखी लड़कियों के लिए भी बिना भारी धन दिये वर नहीं मिलते।

(2) चूंकि धन को मुख्य पदार्थ समझा जाने लगा है,इसलिए लड़कियाँ भी धन कमाने में अधिक ध्यान देने लगी हैं।अधिक धन की आवश्यकता के कारण लड़कियों को भिन्न-भिन्न कार्यालयों में भटकना पड़ता है।नौकरी के लिए फिसलने पर मजबूर हो जाने की दुर्घटनाएँ भी सुनी जाने लगी हैं।

(3) इस अवस्था को देखकर सहशिक्षा तथा अधिक मिलन और सिनेमा इत्यादि के प्रभाव से अब Boy Friend तथा Girl Friend बनाने की और रुचि बढ़ने लगी है व चारित्रिक पतन तेजी से हो रहा है।

(4) मित्र बनाने में एक ही बात देखी जाती है और वह है सौन्दर्य का आकर्षण और साथ ही बिना धन व्यय किये विवाह।शेष और कोई बात नहीं देखी जाती,न कुल,न स्वभाव,न गुण,न कर्म,न चरित्र।
ऐसे विवाह अन्त में दुःख ही के कारण होते हैं।

स्वामी दयानन्द ने शास्त्रों के प्रमाण से 'संस्कार-विधि' में लिखा है कि-
"वधू और वर की आयु,कुल,वास्तव्य-स्थान,शरीर,स्वभाव की परिक्षा अवश्य करें अर्थात् दोनों सज्ञान और विवाह की इच्छा करने वाले हों।स्त्री की आयु से वर की आयु न्यून-से-न्यून ड्योढ़ी और अधिक-से-अधिक दूनी होवे।परस्पर कुल की परिक्षा भी करनी चाहिए।"

और मनुजी ने तो कितनी प्रबल बात 'मनुस्मृति' के अध्याय नौ में कह दी है कि" चाहे लड़का-लड़की मरण-पर्यन्त कुँवारे रहें परन्तु असदृश अर्थात् परस्पर-विरुद्ध गुण,कर्म,स्वभाव वालों का विवाह कभी न होना चाहिए।"

और आजकल गुण,कर्म,स्वभाव न देखकर केवल धन और रुप ही देखा जाता है।इसलिए आजकल गृहस्थाश्रम दुःखों से भरपूर हो गया है।
वेद तो ये कह रहे हैं कि गृहस्थ सुख,आनन्द,परोपकार और लोक-परलोक सुधारने के लिए है।मानव-जीवन-यात्रा लम्बी है,दो साथी मिल जाएँ तो यात्रा सरलता से हो सकती है।और अब इस आश्रम का उद्देश्य ही कुछ और हो गया है।आज के गृहस्थों के दुःख का बुनियादी कारण गुण,कर्म,स्वभाव देखे बिना विवाह करना है।

दुःख का दूसरा कारण:-
संस्कार में जो सप्तपदी-क्रिया है,उसमें पत्नि वर के साथ सात कदम चलती है।सातवें पग पर पति पत्नि को 'सखे' शब्द से सम्बोधित करता है अर्थात् अब दोनों मित्र और सखा बन गये हैं।अतः गृहस्थाश्रम में दोनों का परस्पर व्यवहार मित्रों जैसा होना चाहिए।
लड़के-लड़की में मित्रता का आरम्भ यहाँ से होता है;पढ़ते हुए कालेज या सिनेमा में नहीं होता।गृहस्थ में प्रवेश करने पर जब पत्नि को ऐसा व्यवहार नहीं मिलता तो द्वेष तथा दुःख की आग सुलग पड़ती है।अपने माता,पिता,भाई तथा सारे सम्बन्धियों से पृथक होकर नारी इसलिए पति-गृह में आती है कि उसे एक मित्र मिल गया है।जब वह मित्रता के स्थान पर क्रूरता और दुर्व्यवहार देखती है तो उदास रहने लगती है।

दुःख का तीसरा कारण स्वार्थ है।जो गृहस्थाश्रम को निस्सन्देह नरक बना देता है।चूंकि यह युग ही अपना प्रभुत्व बढ़ाने,अपनी 'मैं' को ऊँचा करने का है-'मुझे सुख मिलना चाहिए;मुझे किसी के अधीन न होना पड़े;दूसरे सुखी हों या दुःखी,मुझे क्या !'यह निकृष्ट स्वार्थ की भावना गृहस्थाश्रम को दुःखी बना रही है।व्यक्ति या व्यष्टि की अपनी स्वार्थ-सिद्धि ने देश को,जाति को,परिवारों को,सबको दुःखी कर रक्खा है।
सारी दुनिया के दुःख का और परिवारों के दुःख का यह एक बहुत बड़ा कारण है।

दुःख का चौथा कारण है 'सहनशीलता का अभाव'।गृहस्थाश्रम में परिवार में प्रीति,संगठन और प्रेम बनाए रखने के लिए सहनशीलता अत्यन्त आवश्य है।बहुतेरे झगड़े इसीलिए शुरु हो जाते हैं कि परिवार में एक-दूसरे की बात सहन नहीं की जाती।

दुःख का पाँचवाँ कारण है 'अति कामवासना'।गृहस्थाश्रम स्वाभाविक कामवासना को मर्यादा में रखने का एक उत्तम साधन है।विवाह का मतलब यह नहीं कि अपना तथा पत्नि का सर्वनाश करने का परमिट मिल गया है।जो पति-पत्नि संयम से रहते हैं उनका प्रेम दिनों-दिन बढ़ता जाता है और जो अपनी इस वासना को तृप्त करने में अति करते हैं उनमें चिड़चिड़ापन,क्रोध,रोग तथा मनमुटाव उभरने लगते हैं।जो पति-पत्नि ऋतुगामी और शास्त्र आदेश के अनुसार चलते हैं उनमें केवल प्रेम ही नहीं,आदर-मान भी बढ़ता है।वे हर समय रोगों के शिकार नहीं बने रहते।

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